ख्वाबो के रंगों में दुनिया को रंग दे , अपने सपनो को खुदा से भी बड़ा कर दे ,
अपने दीप से इस दुनिया को रौशन कर दे, मन अँधेरे बहुत हैं जहाँ में
लेकिन में दीप जलना क्यों छोडू, जग में उजाला करना क्यों छोडू.
हर वक़्त हर जगह निराशाओं के अँधेरे गलियारों में
उम्मीद का मशाल जलना क्यों छोडू.
में इश्वर नहीं, संत नहीं, सूफी फकीर भी नहीं,
इन्सान कहते हैं मुझे ,और इंसानों से लड़ना ही
मेरी पहचान बनती हैं,
लेकिन इस संसार में भातृत्व का
भाव जगाना क्यों छोडू.
आओ इस दिवाली को सार्थक बनाये
दीप जलाये घर रौशन करे
मन के दीपक को भी जगाये , जलाये नहीं,
दुसरो के दुखों के के हम सफ़र बने , हम रह बने,
माना , डगर मुश्किल हैं,
लेकिन इस डगर पर चलना क्यों छोडू
माना अँधेरे बहुत है
लेकिन में दीप जलना क्युओं छोडू
माना अँधेरे बहुत है जहां में
ReplyDeleteपर मैं दीप जलना क्यों छोडू ?
.... अच्छी पंक्ति है
....लिखते रहिये शुभकामनाएँ