Thursday, October 7, 2010
kya khoya kya paya
ज़िन्दगी में आगे बढ़ने की चाहत में इन्सान इंसानियत को भुलाने लगा है. एक साधारण इन्सान की ज़िन्गागी में प्रथमिकताये सिर्फ अपने तक सिमट गयी है , खुद के लिए अपनी क्षमताव से बढ़कर एक नौकरी , अशो आराम के साधन और अपने परिवारजनों के लिए एक बेहतर ज़िन्दगी, इससे बढ़कर आगे कोई क्यों सोचे आखिर हमारा जाता क्या है , सर्कार सोचे, हमने अपना घर साफ किया और कुरा सड़क पर फेक दिया , हम हो गए साफ, अब नगर निगम सोचे, पड़ोस के गाँव में जो की भारत जैसे कृषि प्रधान देश में आता है भूख से लोगोकी मौत हो जाती है, अरे भाई में क्यों सोचु . में सोचूंगा जब मेरी नौकरी मंदी की वजह से या किसी और कारन से चली जाएगी ,या जब मेरा कोई अहित होगा तब. लेकिन तब दुसरे नहीं सोचेंगे. जरा जल्दी सोचे , कही सोच ही नहीं ख़त्म हो जाये.
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wah bhai wah....
ReplyDeleteलिखते रहे .. शुभकामनाएं ..
और इसी सन्दर्भ में मेरी एक कविता भी जरूर पढ़ें!
http://pankaj-patra.blogspot.com/2009/07/prakash-pankaj-poem-insaan-khud-ko.html